‘हर नागरिक को राज्य के किसी भी फैसले की आलोचना का अधिकार’।
मुंबई : महाराष्ट्र के एक कॉलेज में कार्यरत कश्मीरी प्रोफेसर जावेद अहमद हजाम ने अपने वॉट्सऐप पर एक स्टेटस लगाया था। ये स्टेटस कश्मीर से आर्टिकल 370 खत्म किए जाने के विरोध में था। इसके अलावा पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस मनाने से भी जुड़ा था। इसी मामले में पुलिस ने क्रिमिनल केस दर्ज किया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अहम फैसला सुनाया है। कश्मीरी प्रोफेसर जावेद अहमद हजाम के केस में बड़ा फैसला दिया।सुप्रीम कोर्ट का प्रोफेसर पर दर्ज सभी केस खत्म करने का आदेश दिया।प्रोफेसर ने 5 अगस्त को ‘जम्मू-कश्मीर के लिए काला दिन’ कहा था। और कोर्ट ने सरकारी फैसलों की आलोचना करने के अधिकार के महत्व का जिक्र किया ।सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सरकारी फैसलों की आलोचना करने के अधिकार के महत्व को दोहराया है। सर्वोच्च अदालत ने असहमति के अधिकार को बरकरार रखते हुए जोर देकर कहा कि आलोचना को अपराध नहीं माना जाना चाहिए। इसे दबाने से लोकतंत्र कमजोर होगा। पुलिस को संविधान की ओर से दी गई ।अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में संवेदनशील होना चाहिए। कोर्ट ने ये टिप्पणी महाराष्ट्र में काम करने वाले कश्मीरी प्रोफेसर जावेद अहमद हजाम से जुड़े एक केस में की।महाराष्ट्र के कोल्हापुर कॉलेज में कार्यरत कश्मीरी प्रोफेसर जावेद अहमद हजाम के खिलाफ एक वॉट्सऐप स्टेटस के लिए आपराधिक मामला दर्ज किया गया था। इसमें उन्होंने 5 अगस्त को ‘जम्मू और कश्मीर के लिए काला दिन’ कहा था। 14 अगस्त को पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस मनाने की बात भी अपने स्टेटस में किया था। इसी को लेकर मामला दर्ज किया गया था। हालांकि, कोर्ट ने आदेश में प्रोफेसर के खिलाफ सभी केस खत्म करने का आदेश दिया। इससे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द करने की याचिका को खारिज कर दिया था।’हम चिप नहीं लगा सकते, प्राइवेसी भी कोई चीज है’, SC ने खारिज की सांसदों-विधायकों की निगरानी वाली याचिका जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि 5 अगस्त को ‘ब्लैकडे’ कहना ‘विरोध और दर्द की अभिव्यक्ति’ है। पीठ ने कहा, पाकिस्तान के लोगों को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं देना ‘एक सद्भावना संकेत है और इसे विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच दुश्मनी, शत्रुता, घृणा या दुर्भावना की भावना पैदा करने वाला नहीं कहा जा सकता है।’ कोर्ट ने जोर देकर कहा कि आलोचना को अपराध नहीं माना जाना चाहिए और इसे दबाने से लोकतंत्र कमजोर होगा। विशेष रूप से, अदालत ने पुलिस को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी के बारे में शिक्षित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।प्रोफेसर जावेद अहमद को आर्टिकल 370 खत्म किए जाने को लेकर सोशल मीडिया पर अपने विचार व्यक्त किए थे। उनके सोशल मीडिया पोस्ट पर उन्हें आपराधिक आरोपों का सामना करना पड़ा। प्रोफेसर ने अपनी पोस्ट में आर्टिकल 370 खत्म किए जाने को लेकर लिखा था कि 5 अगस्त को जम्मू और कश्मीर के लिए ‘ब्लैक डे’ के रूप में संदर्भित किया जाना चाहिए। पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाना शामिल था। सर्वोच्च न्यायालय ने हजाम के खिलाफ सभी मामलों को खारिज कर दिया।सिविल और क्रिमिनल मामलों में लगा स्टे खुद नहीं होगा रद्द, सुप्रीम कोर्ट ने कारण गिना सुनाया फैसला।हालांकि, अदालत ने यह भी आगाह किया कि विरोध या असहमति को लोकतांत्रिक व्यवस्था के बताए गए तरीकों में ही व्यक्त किया जाना चाहिए। संक्षेप में, सर्वोच्च कोर्ट का फैसला सरकार की आलोचना करने के मौलिक अधिकार की पुष्टि करता है और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के ढांचे के भीतर खुले संवाद और असंतोष की संस्कृति को बढ़ावा देता है। कोर्ट ने कहा कि भारत का संविधान, अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत, भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। इस गारंटी के तहत, प्रत्येक नागरिक को अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की कार्रवाई की आलोचना करने का अधिकार है। उन्हें यह कहने का अधिकार है कि वह राज्य के किसी भी फैसले से नाखुश हैं।
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