
‘यूपी में सार्वजनिक जमीनों से 90 दिन में हटाएं अवैध कब्जा’; इलाहाबाद हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी, कहा- प्रधान और लेखपाल को हटाएं
अतिक्रमण न हटाने वाले अधिकारियों के खिलाफ जनता करा सकेगी कार्रवाई, तहसीलदार को भी माना जाएगा दोषी
इलाहाबाद हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी.
प्रयागराज इलाहाबाद उत्तर प्रदेश से राजेश कुमार यादव की खास रिपोर्ट
प्रयागराज :इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सूबे की सार्वजनिक जमीनों से 90 दिनों के अंदर कब्जा हटाने के निर्देश दिए हैं. कोर्ट ने प्रदेशवासियों को इस मामले में उदासीन ग्राम प्रधान और लेखपाल के खिलाफ दीवानी अवमानना की कार्यवाही कराने का भी अधिकार दे दिया है. यह कार्यवाही हाईकोर्ट में की जा सकेगी.
कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून के अनुसार कार्य करने में विफल रहने वाले अधिकारियों के खिलाफ विभागीय और आपराधिक कार्यवाही की जाए. यह आदेश न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि ने झांसी के मुन्नीलाल उर्फ हरिशरण की जनहित याचिका का निस्तारण करते हुए दिया.
‘बिना सड़क जीवन नर्क के समान’ :कोर्ट ने कहा कि किसी सड़क पर कोई बाधा या अतिक्रमण है तो व्यक्ति गलत तरीके से कैद होने को मजबूर हो जाएगा. बिना रास्ता या सड़क, जीवन नर्क के समान है. सड़क आवश्यक है. यह व्यक्ति की ही नहीं, बल्कि समाज के व्यापक जनमानस की शिक्षा, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था, सम्मान आदि को भी प्रभावित करती है. लिहाजा रास्ते या सड़क पर अतिक्रमण नहीं होना चाहिए.
‘फुटपाथ पैदल चलने वालों के लिए’ :कोर्ट ने आगे कहा कि इस मामले में जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाते हुए अतिक्रमण जल्द हटाया जाना चाहिए. अतिक्रमणकारियों पर हर्जाना लगाएं और यदि जरूरी हो तो दोषी अधिकारियों के खिलाफ विभागीय और आपराधिक कार्यवाही करें. कोर्ट पहले ही मान चुकी है कि फुटपाथ पैदल चलने वालों के लिए हैं. इनका उपयोग व्यावसायिक गतिविधियों (जैसे फेरी लगाना या कार क्लिनिक चलाना) या निजी ढांचे के लिए नहीं किया जा सकता इसलिए संबंधित अधिकारी इन्हें बाधाओं से मुक्त रखें.
‘शिकायत की जांच कराएं झांसी एसडीएम’ :कोर्ट ने झांसी के डीएम को निर्देश दिया कि एसडीएम की अध्यक्षता में टीम गठित कर याची की शिकायत की जांच कराएं. यदि राजस्व अभिलेखों में दर्ज सार्वजनिक रास्ते पर अतिक्रमण पाया जाता है तो संबंधित हल्का लेखपाल के विरुद्ध आवश्यक कार्रवाई की जाए. लेखपाल ने सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण से इंकार करते हुए रिपोर्ट प्रस्तुत की थी. यह प्रक्रिया 90 दिनों की अवधि के भीतर पूरी की जाए.
‘न्यायालय अतिक्रमण संबंधित याचिकाओं से भरा’ :कोर्ट ने इस बात पर दुख व्यक्त कि न्यायालय सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर अतिक्रमण से संबंधित जनहित याचिकाओं से भरा है. कोर्ट ने सभी डीएम और एसडीएम को निर्देश दिया कि ऐसे लोगों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू करें जो किसी अतिक्रमण के संबंध में संबंधित तहसीलदार या तहसीलदार न्यायिक को इस आदेश की तिथि से 60 दिनों के भीतर सूचना न दें. साथ ही इसे उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता नियम 2016 के नियम 195 के अंतर्गत कदाचार माना जाए.
‘ग्राम प्रधान पर हो एक्शन’ :कोर्ट ने कहा कि ग्राम प्रधान ग्राम पंचायत की भूमि प्रबंधक समिति का अध्यक्ष होने के नाते कानून के तहत उसे सौंपी गई ग्राम पंचायत की संपत्ति का संरक्षक है. यदि वह उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता नियम 2016 के नियम 66 के तहत सूचना नहीं दे रहा है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए. उप्र पंचायत राज अधिनियम के तहत डीएम, प्रधान को हटाने की कार्यवाही करें.
भूमि पर अतिक्रमण की जानकारी राजस्व आरसी प्रपत्र संख्या 19 द्वारा संबंधित तहसीलदार/तहसीलदार न्यायिक को 60 दिन के भीतर प्रस्तुत की जाए. यदि कोई तहसीलदार या तहसीलदार न्यायिक उप्र राजस्व संहिता 2006 की धारा 67 (नियम 67(6) के तहत अतिक्रमण हटाने संबंधी कार्यवाही कारण बताओ नोटिस की तिथि से 90 दिन के भीतर नहीं करता और पर्याप्त कारण नहीं बताता तो इसे अनुचित आचरण माना जाएगा.
‘पुलिस करे राजस्व अफसरों का सहयोग’ :कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों को भी यह निर्देश दिया कि अतिक्रमण हटाने में राजस्व अधिकारियों को सभी सहयोग और सहायता प्रदान करें. सुनिश्चित करें कि अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया शांतिपूर्ण हो और सार्वजनिक व्यवस्था बनी रहे. कोर्ट ने आयुक्तों, डीएम, अध्यक्षों/सचिवों/प्रभारी अधिकारियों को निर्देश दिया कि मुख्य सचिव को प्रति वर्ष अतिक्रमण हटाने और दोषी अधिकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई से अवगत कराएं.

