
देवरिया लक्ष्मीपुर चकनाली विवाद ने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है। यह मामला अब केवल जमीन या रास्ते का नहीं रहा,बल्कि यह प्रशासनिक लापरवाही,जवाबदेही और न्याय की असली परीक्षा बन गया है। एक चकनाली,जो गांव के जल निकासी का साधन होती है,उसे चकरोड में बदल दिया गया लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी वहीं खड़ा है कि आखिर इसका आदेश किसने दिया?
क्या यह सब बिना लेखपाल,कानूनगो और तहसील प्रशासन की जानकारी के संभव था? क्या प्रधान अपने दम पर इतना बड़ा निर्णय ले सकता था,या फिर उसे किसी उच्च स्तर का संरक्षण प्राप्त था? जब मौके पर उप जिलाधिकारी मौजूद थे,तो उन्होंने उस कार्य को रुकवाया क्यों नहीं,जबकि स्थिति लगातार तनावपूर्ण होती जा रही थी?
सबसे पीड़ादायक सच यह है कि जब तक विवाद बढ़ता रहा,प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। और जैसे ही एक वकील की जान चली गई, अचानक पूरा तंत्र सक्रिय हो गया जांच,बयान,आश्वासन। लेकिन यह सक्रियता पहले क्यों नहीं दिखाई गई? अगर समय रहते हस्तक्षेप किया गया होता,तो शायद आज एक परिवार उजड़ने से बच सकता था।
आज इस घटना को केवल #हार्ट_अटैक कहकर टाल देना सच्चाई से मुंह मोड़ने जैसा है। जब किसी व्यक्ति पर लगातार तनाव, अन्याय और दबाव बनता है, और प्रशासन उसे रोकने में विफल रहता है, तो यह सिर्फ एक प्राकृतिक घटना नहीं रह जाती यह व्यवस्था की विफलता बन जाती है।
अगर प्रधान के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो सकता है, तो फिर उन प्रशासनि अधिकारियों पर समान रूप से कार्रवाई क्यों नहीं हो रही, जिन
की जिम्मेदारी थी कि अवैध कार्य को रोका जाए? क्या उनकी चुप्पी, उनकी निष्क्रियता किसी अपराध से कम है? जब जिम्मेदारी समान है, तो कार्यवाही भी समान क्यों नहीं?
समाज आज यह जानना चाहता है कि चकनाली को चकरोड बनाने की अनुमति किसने दी, किसके आदेश पर यह सब हुआ, और क्यों अब तक उन जिम्मेदार लोगों को कानून के दायरे में नहीं लाया गया। पीड़ित परिवार को केवल सांत्वना नहीं, बल्कि सच्चा न्याय चाहिए—और न्याय तभी पूरा होगा जब हर दोषी, चाहे वह किसी भी पद पर क्यों न हो, जवाबदेह ठहराया जाएगा।
यह समय केवल शोक व्यक्त करने का नहीं, बल्कि सच के साथ खड़े होने का है। अगर आज भी हम चुप रहे, तो यह लापरवाही आगे भी किसी और की जिंदगी छीन सकती है। इसलिए जरूरी है कि निष्पक्ष जांच हो, दोषियों पर सख्त कार्यवाही हो और व्यवस्था को यह संदेश मिले कि अब अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

