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नागपुर

सिकल सेल रोग के गंभीर परिणाम और रोगियो की बढ़ती संख्या को देखते हुए केंद्र सरकार ने एक नई परियोजना शूरू की है। “सिकसेल रोग मुक्त” भारत। यह सरकार की महत्वपूर्ण परियोजना है। संकल्प इंडिया फाउंडेशन के समन्वय मे थैलेसीमिया और सिकलसेल सोसाइटी ऑफ इंडिया महाराष्ट्र राज्य के मेडिकल काॅलेजो और सरकारी अस्पतालो मे एक नई परियोजना शूरू की है। जिसके तहत गर्भवती महिलाओ को गर्भावस्था के पहले तिमाही मे एचपीएलसी परिक्षण के अधिन किया जाता है। सिकलसेल सकारात्मक पाए जाने पर जीवन साथी का भी परिक्षण किया जाता है। जिससे आने वाली संतान को इस बीमारी बचाया जा सके। सिकलसेल रोग से पीड़ित को हाथपैर मे पेट और पूरे शरीर मे दर्द अक्सर बना रहता है। ये दर्द भी असहनीय होता है। कई बार इसको लेकर अस्पताल मे भर्ती भी होना पड़ जाता है। हीमोग्लोबिन की मात्रा शरीर मे कम हो जाती है। जीवन भर दवाऐ लेनी पड़ जाती है। जिससे आर्थिक परेशानी बढ़ जाती है। बढ़ती उम्र के साथ इस रोग की जटिलताएं बढ़ने लगती है। सिकलसेल रोग का स्थाई ईलाज बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन है जिसका खर्च बहुत अधिक होता है। बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन के लिए एचएलए मिलान भी मुश्किल होता है। सिकलसेल वाले रोगी सामान्य होते है। इसलिए लड़का लड़की को शादी से पहले इसकी जांच करवा लेनी चाहिए। डाक्टरो के अनुसार यह एक अनुवांशिक गंभीर रोग है। बौद्ध तेली महार कुनबी और आदिवासी समुदायो मे प्राय यह रोग अधिक पाया जाता है। कुछ हद तक सभी सामान्य समुदायो मे पाया जाता है। पिछले कुछ वर्षो से सिकलसेल रोग को विकलांग व्यक्तियो की सूची मे शामिल किया गया है।

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