
सुप्रीम कोर्ट ने ‘यादव जी की लव स्टोरी’ फिल्म के खिलाफ याचिका को खारिज किया: शीर्षक से किसी समुदाय की छवि नहीं बिगड़ती
खबर का विस्तृत विवरण:
क्या हुआ?
नई दिल्ली से राजेश कुमार यादव की खास रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (25 फरवरी, 2026) को “यादव जी की लव स्टोरी” फिल्म के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया। याचिका में फिल्म के टाइटल को बदलने या रिलीज़ पर रोक लगाने की मांग थी, यह दावा करते हुए कि शीर्षक से यादव समुदाय की छवि खराब होती है।
कौन दायर किया था याचिका?
याचिका विश्व यादव परिषद के प्रमुख द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी।
कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने कहा कि फिल्म के नाम में ऐसा कोई शब्द नहीं है जो यादव समुदाय को नकारात्मक रूप में पेश करता हो।
शीर्षक केवल “यादव जी” का संदर्भ है, जिसमें कोई अपमानजनक या अप्रीतिकर शब्द नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि यह मामला “घूसखोर पंडित” जैसी पिछली फिल्म विवाद से अलग है, क्योंकि उसमें नकारात्मक शब्द का प्रयोग हुआ था।
क्या कोर्ट ने फिल्म को बैन किया?
नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने न तो फिल्म को बैन किया, न ही शीर्षक बदलने का निर्देश दिया। याचिका देखते ही खारिज कर दी गई।
फिल्म कब रिलीज़ होगी?
फिल्म “यादव जी की लव स्टोरी” 27 फरवरी, 2026 को थिएटरों में रिलीज होने वाली है।
याचिकाकर्ता की दलीलें:
याचिकाकर्ता का कहना था कि फिल्म में यादव समुदाय को गलत तरीके से दिखाया गया है और इसमें एक हिंदू लड़की का मुस्लिम लड़के से विवाह दिखाया गया है, जो सामाजिक दृष्टिकोण से प्रश्न उठाता है। कोर्ट की प्रतिक्रिया:
कोर्ट ने याचिका की दलीलों को बेबुनियाद बताया और यह कहा कि फिल्म एक कल्पनात्मक (fiction) काम है, न कि किसी समुदाय को अपमानित करने वाला तथ्यात्मक दस्तावेज।
निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म के शीर्षक और रिलीज पर किसी भी रोक की मांग को खारिज कर दिया, क्योंकि शीर्षक में किसी भी समुदाय के खिलाफ नकारात्मक संकेत नहीं हैं।
📜 सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुख्य हिस्से — प्रत्यक्ष उद्धरण
🔸 “We fail to understand how the title of the film reflects the community in bad light.”
— कोर्ट ने कहा कि फिल्म का शीर्षक किसी भी रूप में यादव समुदाय को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत नहीं करता।
🔸 “The title of the film does not have any adjective or any word that portrays the Yadav community in bad light.”
— स्पष्ट रूप से कहा गया कि शीर्षक में किसी भी समुदाय के खिलाफ कड़वा या नकारात्मक शब्द नहीं है।
🔸 “The apprehensions are wholly unfounded.”
— याचिकाकर्ता की चिंता को पूरी तरह निराधार बताया गया।
“The expression ‘ghooskhor’ … A negative meaning was being attached to the community. In the instant case no such negativity is attached to the Yadav community.”
— कोर्ट ने अपने पहले के फैसले ‘घूसखोर पंडत’ से तुलना करते हुए कहा कि उस नाम में लोगों को भ्रष्ट दिखाने वाला शब्द था, लेकिन इस मामले में ऐसा कुछ नहीं है।
The Tribune
“Neither of the reasonable restrictions under Article 19(2) of the Constitution are attracted.”
— कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगने वाले युक्तिगत प्रतिबंध इस मामले में लागू नहीं होते।
सुनवाई के दौरान कोर्ट की टिप्पणियाँ
“Have a thick skin. It is fiction. In one week it will all be over.”
— कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि फिल्म एक कहानी (fiction) है और ऐसे विवाद जल्दी खत्म हो जाते हैं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि फिल्म रिलीज़ के बाद किसी समुदाय की भावनाओं को वास्तव में ठेस पहुँचाती है, तो याचिकाकर्ता कोर्ट में पुनः अपील कर सकते हैं।
केस का शीर्षक व संदर्भ
Case No.: W.P.(C) No. 252/2026
याचिकाकर्ता: Awdesh Kumar Yadav – Vishwa Yadav Parishad के प्रमुख
विषय: फिल्म “Yadav Ji ki Love Story” के टाइटल को बदलने या रिलीज़ रोकने की मांग
📌 फैसले का सार (Summary)
✔ कोर्ट ने कहा कि फिल्म का शीर्षक किसी भी समुदाय विशेष का अपमान नहीं करता.
घूसखोर पंडत जैसे पुराने विवाद से यह मामला अलग है क्योंकि वहाँ नकारात्मक शब्द लगा था, लेकिन यहाँ ऐसा नहीं है।
इसलिए याचिका को खारिज कर दिया गया — फिल्म को बंद या टाइटल बदलने का कोई आदेश नहीं दिया गया।
: 📄 सुप्रीम कोर्ट के फैसले — मुख्य बातें (Documented Order Summary)
📌 फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म “यादव जी की लव स्टोरी” के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया — न तो फिल्म को बैन किया गया और न ही उसका शीर्षक बदलने का निर्देश दिया गया। �
🔎 आदेश के मुख्य अंश (Reported Language)
✔ कोर्ट ने कहा कि टाइटल में किसी भी समुदाय के खिलाफ कोई अपमानजनक शब्द नहीं है।
➡ “The title of the film nowhere has any adjective or any word that portrays the Yadav community in bad light.” — सुप्रीम कोर्ट की बेंच (जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां)। �
✔ कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने किसी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का ठोस प्रमाण पेश नहीं किया।
➡ “We fail to understand as to how the title of a film can reflect the community in bad light… The apprehensions are wholly unfounded.” — सुप्रीम कोर्ट।
✔ कोर्ट ने अपने पिछले फैसले ‘घूसखोर पंडत’ का हवाला दिया और कहा कि उस मामले में नाम में नकारात्मक अर्थ था, जबकि यहाँ ऐसा कोई शब्द नहीं है। �
✔ कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत कोई प्रतिबंध लागू नहीं होते, क्योंकि ट्वीट/टाइटल से स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति कम नहीं होती। �
✔ कोर्ट ने यह कहा कि अगर फिल्म रिलीज़ के बाद भी किसी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाती है, तो याचिकाकर्ता फिर से कोर्ट में याचिका दायर कर सकते हैं। �
📜 सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विस्तृत और भरोसेमंद सार (Reported Order)
🧑⚖️ किसने सुनाई?
पीठः जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां। �
🧑⚖️ मामला:
Awdesh Kumar Yadav v. Union of India — याचिका जिसमें फिल्म “Yadav Ji ki Love Story” के खिलाफ टाइटल बदलने या रिलीज़ रोकने की मांग की गई थी। �
⚖️ कोर्ट की मुख्य बातें (जैसा कि आदेश/सुनवाई में कहा गया)
1️⃣ फिल्म का शीर्षक ‘Yadav Ji ki Love Story’ किसी समुदाय को नकारात्मक रूप में नहीं दिखाता।
👉 कोर्ट ने स्पष्ट कहा:
“We fail to understand how the title of a film can reflect the community in bad light. The title of the film nowhere has any adjective or any word that portrays the Yadav community in bad light.” �
The Tribune
2️⃣ याचिकाकर्ता की चिंताएँ “बेबुनियाद” (wholly unfounded) हैं।
👉 कोर्ट ने कहा कि केवल शीर्षक के कारण किसी समुदाय का नाम बदनाम नहीं ठहराया जा सकता।
3️⃣ देश के संविधान के अनुच्छेद 19(2) —
👉 न्यायालय ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नाबुनियादी प्रतिबंध लागू नहीं होते हैं क्योंकि फ़िल्म शीर्षक में कोई नकारात्मक संकेत नहीं हैं। �
4️⃣ ‘घूसखोर पंडत’ मामले से फर्क:
👉 कोर्ट ने अपने हाल के फैसले ‘घूसखोर पंडत’ का हवाला देते हुए कहा कि उसमें संस्कारहीन/नकारात्मक शब्द इस्तेमाल हुआ था, जबकि इस फिल्म में ऐसा नहीं है।
5️⃣ फिल्म को fiction (कल्पनात्मक कहानी) माना गया:
👉 कोर्ट ने कहा कि फिल्म एक कल्पनात्मक कहानी है और ऐसा कोई स्पष्ट सबूत नहीं है कि इससे समुदाय की भावनाएँ गंभीर रूप से ठेस पहुँचेंगी। �
6️⃣ कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया:
👉 कोर्ट ने न तो रिलीज़ रोकने का आदेश दिया, न ही शीर्षक बदलने का निर्देश दिया। याचिका को dismiss कर दिया गया। �
Deccan Chronicle
7️⃣ कोर्ट ने भविष्य की अपील की अनुमति दी:
👉 सुनवाई के दौरान कहा गया कि अगर फिल्म रिलीज़ के बाद कुछ सच में समुदाय की भावनाओं को चोट पहुँचाती है, तो याचिकाकर्ता फिर से कोर्ट में आ सकते हैं। �
📍 संक्षेप में: ✔ फिल्म का शीर्षक न तो किसी समुदाय का अपमान करता है
✔ कोर्ट ने याचिका को खारिज किया
✔ न रिलीज़ रोका गया, न शीर्षक बदला गया
✔ फिल्म को fiction माना गया
✔ याचिकाकर्ता को भविष्य में फिर से अपील करने की अनुमति दी गई — यदि फिल्म में वास्तविक सामग्री से चोट पहुँचे। �

