
सच बोलकर झूठ रचता मीडिया: भ्रम की सबसे खतरनाक फैक्ट्री
मीडिया क्यों सच बोलकर भी झूठ पैदा करता है? यह सवाल जितना विरोधाभासी लगता है, उतना ही हमारे समय की सच्चाई को खोल देता है। आम समझ में सच और झूठ एक-दूसरे के दुश्मन हैं। लेकिन आधुनिक मीडिया के दौर में झूठ अक्सर सच के भीतर ही पनपता है। आज झूठ फैलाने के लिए तथ्य गढ़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती। सच को चुनकर, सजाकर, दोहराकर और संदर्भ से काटकर ही एक ऐसी दुनिया रच दी जाती है, जो देखने में सच्ची और असर में झूठी होती है।
मीडिया कभी पूरा सच नहीं दिखाता, क्योंकि पूरा सच दिखाना किसी भी सत्ता के लिए असुविधाजनक होता है। वह सच का चयन करता है। कौन सा तथ्य ख़बर बनेगा और कौन सा नहीं—यह संपादकीय निर्णय नहीं, राजनीतिक निर्णय होता है। हर घटना के सैकड़ों पहलू होते हैं, लेकिन मीडिया कुछ को रोशनी में रखता है और बाक़ी को अंधेरे में छोड़ देता है। छोड़े गए तथ्य झूठ नहीं होते, पर उनकी अनुपस्थिति से जो तस्वीर बनती है, वह झूठ का काम करती है।
यही आज का सबसे परिष्कृत झूठ है—अधूरी सच्चाइयों से बनी पूरी कहानी। मीडिया निश्चिंत होकर कह सकता है, “हमने तो कोई झूठ नहीं बोला।” तकनीकी रूप से यह सही भी होगा। लेकिन दर्शक के मन में जो अर्थ बैठता है, वह पहले से तय होता है—सत्ता के अनुकूल, व्यवस्था के हित में, सवालों को निष्क्रिय करने वाला।
मीडिया इसे फ्रेमिंग कहता है। एक ही तथ्य, अलग फ्रेम—और अर्थ पूरी तरह बदल जाता है। विरोध आंदोलन हो तो वह ‘अराजकता’ बन जाता है, और वही सत्ता समर्थक प्रदर्शन ‘देशभक्ति’। युद्ध कहीं ‘आत्मरक्षा’ है, कहीं ‘सर्जिकल स्ट्राइक’। तथ्य जस का तस रहता है, भाषा बदलते ही सच का चरित्र बदल जाता है। यहां मीडिया सच को छिपाता नहीं, बल्कि उसे इस तरह पेश करता है कि दर्शक वही निष्कर्ष निकाले, जो सत्ता चाहती है। यही वह बिंदु है जहां सच बोलते हुए झूठ पैदा होता है।
सूचना के इस युग में समस्या जानकारी की कमी नहीं, उसकी बाढ़ है। हर मिनट ब्रेकिंग न्यूज़, हर घटना पर दर्जनों विशेषज्ञ, हर स्क्रीन पर शोर। इस बाढ़ का नतीजा ज्ञान नहीं, थकान है। थका हुआ दर्शक सोचता नहीं, प्रतिक्रिया देता है। मीडिया इस मनोविज्ञान को समझता है। वह सोचने का समय छीन लेता है। एक खबर पूरी होने से पहले दूसरी शुरू हो जाती है। सच बिखर जाता है और मन में बस एक भावना बचती है—डर, गुस्सा, गर्व या नफ़रत। झूठ यहीं जन्म लेता है, किसी गलत तथ्य से नहीं, बल्कि सोचने की क्षमता के क्षरण से।
फ्रांसीसी दार्शनिक जीन बॉडरिलार्ड ने कहा था—हम वास्तविकता में नहीं, सिमुलेशन में जीते हैं। मीडिया इस सिमुलेशन का सबसे बड़ा निर्माता है। राजनीति, युद्ध, आपदा, विरोध—सब तमाशा बन जाते हैं। कैमरा, ग्राफिक्स, संगीत और एंकर की आवाज़ मिलकर ऐसी नाटकीयता रचते हैं कि सच एक दृश्य में बदल जाता है। और जब सच दृश्य बनता है, तो उसका नैतिक और ऐतिहासिक संदर्भ गायब हो जाता है। दर्शक घटना को नहीं, उसकी प्रस्तुति को याद रखता है। यही अर्थहीन सच, झूठ का सबसे उन्नत रूप है।
मीडिया खुद को लोकतंत्र का चौकीदार बताता है, लेकिन व्यवहार में वह अक्सर सत्ता का साझेदार बन जाता है। यह साझेदारी आदेश से नहीं, हितों से चलती है—टीआरपी, विज्ञापन, एक्सेस और राष्ट्रवादी भावनाओं से। नोम चोम्स्की ने इसे ‘मैन्युफैक्चरिंग कंसेंट’ कहा था। मीडिया सीधे प्रचार नहीं करता, बल्कि ऐसी सहमति गढ़ता है जिसमें सत्ता के फैसले स्वाभाविक, अनिवार्य और नैतिक लगने लगते हैं। यहां झूठ किसी एक खबर में नहीं, बल्कि पूरे नैरेटिव में छिपा होता है।
राजनीति और मनोरंजन के बीच की रेखा लगभग मिट चुकी है। नेता बयान देता है, मीडिया उसे शो में बदल देता है। सवाल गायब हो जाते हैं, किरदार बचते हैं। सिस्टम अदृश्य हो जाता है। यही अदृश्यता सबसे बड़ा झूठ है।
आज एल्गोरिदम तय करता है कि आप क्या देखेंगे, कितनी बार देखेंगे और किस एंगल से देखेंगे। इसका लक्ष्य सच नहीं, जुड़ाव और मुनाफा है। आपको वही दिखाया जाता है, जो आपकी पूर्व धारणाओं को मजबूत करे। असहमति गायब हो जाती है। झूठ यहां भी किसी गलत सूचना से नहीं, बल्कि सच के फ़िल्टर से पैदा होता है।
मीडिया नैतिक भाषा का भी चयन करता है। कहीं बच्चों की मौत ‘मानवीय त्रासदी’ है, कहीं ‘कोलैटरल डैमेज’। शब्द तय करते हैं कि दर्शक दुख महसूस करेगा या नहीं। झूठ यहां तथ्य में नहीं, सहानुभूति के वितरण में होता है।
इसलिए मीडिया का संकट यह नहीं कि वह झूठ फैलाता है। संकट यह है कि वह सच को इस तरह व्यवस्थित करता है कि झूठ अपने आप पैदा हो जाए। यह झूठ पकड़ में नहीं आता, क्योंकि वह तथ्यों के भीतर छिपा होता है।
मीडिया की आलोचना का मतलब हर खबर को झूठ कहना नहीं है। इसका मतलब हर सच से सवाल करना है—यह क्यों दिखाया गया? यह कैसे दिखाया गया? और इससे कौन सा सच अदृश्य कर दिया गया?
जब तक ये सवाल ज़िंदा हैं, तब तक लोकतंत्र ज़िंदा है। जिस दिन ये सवाल मर गए, उस दिन सच भी झूठ का सबसे विश्वसनीय रूप बन जाएगा।

