
फिलिस्तीन की मान्यता: 21वीं सदी का कूटनीतिक मोड़
स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ ने जब यह कहा कि “किसी भी देश की रक्षा के नाम पर 60 हज़ार निर्दोष नागरिकों की हत्या, अस्पतालों पर बमबारी और बच्चों को भूख से मरने के लिए छोड़ देना न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता,” तो यह केवल ग़ज़ा में इज़रायल की कार्रवाई की आलोचना भर नहीं थी। यह बयान पूरी दुनिया के लिए चेतावनी था कि 21वीं सदी अपनी सबसे काली त्रासदी का साक्षी बन रही है और अब अंतर्राष्ट्रीय समुदाय चुप नहीं रह सकता।
इसी सप्ताह न्यूयॉर्क में फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने फ़िलिस्तीन को औपचारिक मान्यता देकर कहा कि “यही वह रास्ता है जो इज़रायल को शांति से जीने देगा।” यह केवल यूरोप की भाषा नहीं बदली है, बल्कि यह संकेत है कि अमेरिका के अंध समर्थन से अलग हटकर वैश्विक राजनीति में एक नया संतुलन उभर रहा है।
# बदलता हुआ राजनीतिक परिदृश्य
संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से तीन-चौथाई से अधिक पहले ही फिलीस्तीन को मान्यता दे चुके हैं। हाल ही में ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और पुर्तगाल जैसे परंपरागत अमेरिकी सहयोगियों ने भी इस पंक्ति में शामिल होकर कूटनीतिक परिदृश्य को नया आयाम दिया है। बेल्जियम, लक्ज़मबर्ग और माल्टा जैसे छोटे यूरोपीय देशों ने भी इस मान्यता का समर्थन किया है, भले ही कुछ ने इसे हमास के निरस्त्रीकरण और बंधकों की रिहाई से जोड़ा हो।
इसके विपरीत, इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू फिलीस्तीन को मान्यता देने को “आतंकवाद का इनाम” बताते हुए स्पष्ट कह चुके हैं कि “जॉर्डन नदी के पश्चिम में कोई फिलीस्तीनी राज्य कभी अस्तित्व में नहीं आएगा।” यह जिद न केवल दो-राष्ट्र समाधान की संभावना को खत्म करती है, बल्कि इज़रायल को अपने ही सहयोगियों के बीच अलग-थलग करने का ख़तरा भी पैदा करती है।
# भूराजनीतिक और कूटनीतिक प्रभाव
अटलांटिक के दोनों किनारों पर बन रही यह दरार वैश्विक कूटनीति का नक्शा बदल सकती है। यूरोप अब पहले की तरह वाशिंगटन का अंधानुकरण करने को तैयार नहीं दिख रहा। अमेरिका की अडिग स्थिति भले ही इज़रायल को अल्पकालिक सुरक्षा दे, परंतु यह उसकी वैश्विक मध्यस्थ की छवि को गहरी क्षति पहुँचा रही है।
भारत के लिए यह एक संवेदनशील क्षण है। वह उन पहले देशों में रहा है जिसने फिलीस्तीन को मान्यता दी, लेकिन पिछले दो दशकों में इज़रायल के साथ उसकी सामरिक साझेदारी भी गहरी हुई है। ऐसे में भारत को अपनी “रणनीतिक संतुलन” की नीति और स्पष्ट करनी होगी।
# मानवीय संकट
भूराजनीतिक समीकरणों से परे, यह एक गहरा मानवीय संकट है। ग़ज़ा में अस्पतालों, स्कूलों और शरणार्थी शिविरों पर हमलों ने हज़ारों निर्दोषों की जान ली है। प्रतिशोध की कार्रवाई अब “सुरक्षा” की सीमा से आगे बढ़कर सामूहिक सज़ा का रूप ले चुकी है।
यूरोपीय संघ की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने स्वीकार किया है कि “ग़ज़ा की त्रासदी ने दुनिया के ज़मीर को झकझोर दिया है।” पूर्व राजनयिकों और अधिकारियों ने इज़रायल पर कड़े कदम उठाने की अपील की है। यह दर्शाता है कि अब नैतिक दबाव भी राजनीतिक दबाव जितना ही प्रभावी होता जा रहा है।
# आगे का रास्ता
फिलिस्तीन की मान्यता अब केवल प्रतीकात्मक कदम नहीं है। यह इस बात की परीक्षा है कि क्या अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था न्याय और मानवता पर टिकेगी या फिर केवल शक्ति और स्वार्थ से संचालित होगी।
मैक्रों ने सही कहा कि “फिलिस्तीनियों के अधिकारों की मान्यता इज़रायलियों के अधिकारों को कम नहीं करती।” दरअसल, यही वह एकमात्र ढांचा है जो दोनों समाजों को सुरक्षा और शांति प्रदान कर सकता है।
प्रश्न यह है कि क्या इज़रायल का नेतृत्व—और उसका सबसे बड़ा सहयोगी अमेरिका—इस सच्चाई को सुनने के लिए तैयार है? अगर नहीं, तो इतिहास इस युद्ध को “सुरक्षा की लड़ाई” नहीं, बल्कि एक मानवीय त्रासदी और इज़रायल की कूटनीतिक अलगाव की गति तेज करने वाली घटना के रूप में याद करेगा।
“फिलिस्तीन की मान्यता यात्रा का अंत नहीं, बल्कि शुरुआत है। दुनिया आज एक चौराहे पर खड़ी है—जहाँ एक ओर अनंत युद्धों का रास्ता है और दूसरी ओर शांति को अवसर देने का। चुनाव अब वैश्विक नेतृत्व के हाथ में है।”

