आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन के संरक्षण एवं अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद करने आजाद हिंद फौज के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस और प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में गठित मांझी सरकार के सैनिक आज भी सक्रिय हैं।
आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन के संरक्षण एवं अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद करने आजाद हिंद फौज के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस और प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में गठित मांझी सरकार के सैनिक आज भी सक्रिय हैं। संगठन 1942 को बना था। नेतृत्वकर्ता कंगला मांझी हीरा सिंह देव के 41वीं शहादत दिवस पर 5 दिसंबर को उनकी समाधि स्थल डौंडीलोहारा के बघमार में मांझी सरकार के सैनिक सलामी देंगे। उनका निधन 5 दिसंबर 1984 को हुआ था।
कार्यक्रम में राजमाता फुलवा देवी कांगे भी शामिल होंगी। कंगला मांझी को श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी। आयोजन के एक दिन पहले महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, झारखंड, दिल्ली से सैनिक पहुंच रहे हैं। गुरुवार देर शाम तक लगभग एक हजार मांझी सरकार के सैनिक पहुंच चुके थे। उनके समाधि परिसर को सजाया जा रहा है।
आदिवासी समाज के क्रांतिकारी सदस्य मांझी सरकार का जन्म बस्तर के तेलावट में हुआ था। अंग्रेजों के अन्याय के खिलाफ 1913 से वे स्वतंत्रता आंदोलन में जुड़ गए। बालोद जिले के डौंडीलोहारा विकासखंड के गांव बघमार को मुख्यालय बनाकर अभियान शुरू किया। वे दो साल तक एकांतवास में रहे। उनके राष्ट्रहित आंदोलन से लोगों में नया जोश आया। इसके बाद से देशभर में मांझी के सैनिक तैयार होने लगे।
कंगला मांझी के पुत्र केडी कांगे ने बताया कि 1914 में अंग्रेजों ने बस्तर के आदिवासियों को दबाने की कोशिश की थी। सैकड़ों लोगों की हत्याएं हुईं। इसी दौरान जेल में मांझी सरकार की मुलाकात महात्मा गांधी से हुई थी। 1920 में कोलकाता में महात्मा गांधी से मिले। इसके बाद मांझी को राष्ट्रीय नेताओं का सहयोग मिलना शुरू हो गया। उन्होंने नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज की तरह वर्दीधारी सैनिकों की फौज तैयार की।
मांझी सरकार के वर्दीधारी सैनिक देशभर में फैले हैं, जो अपनी तरह से देश सेवा में लगे रहते हैं। कंगला मांझी के निधन के बाद उनके आंदोलन को आगे बढ़ा रहे हैं। अभी अखिल भारतीय माता दंतेवाडी समाज समिति संगठन संचालित हो रहा है। उनके कार्यों से प्रसन्न होकर 1951 में नेहरू ने बिल्ला प्रदान किया था। 1956 में उन्हें दुर्ग जिले की कचहरी में तिरंगा फहराने का गौरव प्राप्त है।
माझी सैनिकों का अनुशासन
मांझी सरकार के सैनिक दूरदराज से आ रहे हैं। इन सैनिकों में एक खास बात यह है कि लोग पूरी तरह से अनुशासन में रहते हैं। कंगला माझी सरकार को श्रद्धांजलि देने के लिए बड़ी संख्या में सैनिक आए हुए हैं। ये लोग तंबू लगाकर और पेड़ों के नीचे रात गुजार रहे हैं।
स्वतंत्रता आंदालेन में हुए शामिल
मांझी सैनिक के बारे में मध्यप्रदेश के राजीव चक्रधारी ने जानकारी दी कि स्वतंत्रता आंदोलन के समय अंग्रेजों के दमन को कुचलने आदिवासी समाज के क्रांतिकारी सदस्य मांझी का जन्म बस्तर के तेलावट में हुआ था। अंग्रेजों के अन्याय के खिलाफ 1913 से वे स्वतंत्रता आंदोलन में जुड़ गए। डौंडीलोहारा विकासखंड के बघमार गांव से उन्होंने अपना अभियान शुरू किया। बघमार को अपना मुख्यालय बनाया। वे दो साल तक एकांतवास में रहे। उनके राष्ट्रहित आंदोलन से लोगों में एक नया जोश आया। उसके बाद से देशभर में मांझी के सैनिक तैयार होने लगे।
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