बसंत पंचमी का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व -, राजकुमार अश्क
*जौनपुर। शाहगंज बसंत पंचमी का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व* सर्व प्रथम बसंत पंचमी एवं सरस्वती पुजन पर सभी सुधी पाठको को बहुत बहुत बधाई, बसंत आपके जीवन में खुशियाँ लेकर आये. हिंदू धर्म से जुडा़ हर त्योहार यदि आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है तो उसके अंदर वैज्ञानिक आधार भी समाहित होता है. हर त्योहार हमें प्रकृति से नजदिकीयाँ बढ़ाने का संदेश देता हैं। इसी प्रकार बसंत पंचमी का अगर धार्मिक महत्व है तो इसका वैज्ञानिक महत्व भी कुछ कम नहीं है. हमारे मनीषियों ने कितनी वैज्ञानिकता के साथ हर त्योहार को धार्मिक बना दिया. बसंत का अर्थ होता है सभी ऋतुओं का राजा। यह बसंत महीने की शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाने वाला त्योहार है, इस समय प्रकृति अपनी पूर्ण सौंदर्य पर होती है हर तरफ़ फसलें लहलहाती है जिसे देखकर किसान का मन रूपी मयूर नाचने लगता है. पूरे वातावरण में एक अजीब सी मदहोशी छाई रहती है। प्रकृति पूर्ण सौंदर्य करके अपने पूरे ऊरूज पर रहती है, भगवान श्रीकृष्ण ने भी गीता में स्वंय कहा है कि ऋतुओं में मैं बसंत हूँ. यह वह समय होता है जब प्रकृति अपने पंच तत्व को पुरी तरह निखारने के लिए तैयार होती है. प्रकृति में चारों तरफ़ पीला रंग बिखर जाता है, खेतों में गदराई सरसों और मटर के फूल अपनी बाहें फैलाए मानों कह रहें हो *समेट लो इस पल को अपने आंचल में कही बिखर न जाए पूरवैया से* हिंदू धर्म में पीले रंग को बहुत शुभ मान कर इसको अनेकों रूपों में पूजने, पहनने और खाने आदि का भी वर्णन हमारे धार्मिक ग्रन्थों में मिलता है, स्वयं भगवान श्रीकृष्ण भी पीला वस्त्र धारण करते थे इसी कारण उन्हें पीताम्बर धारी भी कहा जाता है. *पीले रंग का महत्व*:- वैसे तो हर रंग की अपनी एक विशेष खासियत होती है मगर हिंदू धर्म में पीले रंग को महत्वपूर्ण स्थान देते हुए इसे शुभ माना जाता है. पीला रंग एक तरफ़ अगर शुद्धता का प्रतीक माना जाता है तो दूसरी तरफ़ यह सात्विकता, सादगी, निर्मलता को भी दर्शाता है. फेंगशुई के अनुसार यह रंग आत्मिक रंग है,पीला वस्त्र ऊष्मा का वाहक भी माना जाता है जिसे धारण करने से सूर्य की किरणें सीधे हमारे मष्तिष्क पर असर करती है और हमें संतुलन, एकाग्रता, और तारतम्य स्थापित करने में सहायता मिलती है. *पौराणिक महत्व*:- जब ब्रह्मा जी ने इस सृष्टि की रचना कर दी तब भी उन्हें इसमें निरसता का आभास होता रहा, हर तरफ एक शुन्य सा दिखाई देता था. सभी चर अचर प्राणी निरसता के भाव से घिरे हुए महसूस हो रहें थे तब ब्रह्मा जी ने सृष्टि के पालन कर्ता भगवान विष्णु ने इस निरसता को दूर करने के लिए अपने कमंडल से जल की कुछ बुदे इस पृथ्वी पर छिडकी जिससे पृथ्वी पर एक अद्भुत चार भुजाओं वाली शक्ति प्रकट हुई, जिसके एक हाथ में पुस्तक, एक हाथ में वीणा, एक में पुष्प तथा एक हाथ में माला थी. ब्रहमा जी ने उस देवी से अपनी वीणा को बजाने की प्रार्थना की, उस देवी ने जैसे ही अपनी वीणा के तारों को छेडा़ उसकी झंकार से सात मधुर स्वर लहरी निकली जिसे सरगम नाम दिया गया. इसी झंकार से प्रकृति में व्याप्त सारे चर अचर जीव जो चेतना शुन्य थे सभी चैतन्य अवस्था में आकर नृत्य करने लगे, ऋषि मुनियों ने वेद मंत्रों से सारे वातावरण को भक्ति मय बना दिया. इसी कारण इस दिन माता सरस्वती की पूजा होती है, और माताएँ अपने बच्चों को अक्षर ज्ञान करवाना भी इस दिन शुभ मानती है. बसंत पंचमी के पर्व का महत्व रामायण काल से भी माना जाता है, जब माता सीता को रावण अपनी नगरी लंका लेकर चला गया था उस समय भगवान राम उन्हें खोजते हुए दक्षिण की ओर बढे उनमें एक स्थान दण्डकारण्य भी था, यही वह स्थान था जहाँ पर भीलनी जाति की शबरी रहती थी.जब राम उसकी कुटिया में पहुंचे तो उसने प्रेम से अभिभूत होकर अपने जूठे बेर उन्हें खाने के लिए दिए, जिसे भगवान राम ने बड़े ही प्रेम से ग्रहण किया. ऐसा कहा जाता है कि जिस दिन भगवान राम माता शबरी की कुटिया में गयें थें वह बसंत पंचमी का ही दिन था. दण्ड कारण्य का वह क्षेत्र इस समय गुजरात और मध्य प्रदेश की सीमा पर है जहाँ माता शबरी का एक मंदिर भी है वही पर एक शिला खण्ड भी है ऐसा माना जाता है कि प्रभु राम इसी शिला खण्ड पर बैठे थे. हर साल बसंत पंचमी के दिन इस स्थान पर एक मेला लगता है.
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