आंख की एक सीमा। है। एक परिधि है वह।ज्यादा दूर नहीं देख सकती। वह ज्यादा पास नहीं देख सकती आंखों का देखने का एक विस्तार है। किसी चीज को आंख के बहुत पास ले आए हैं फिर आंख नहीं देख पाएगी। बहुत दूर ले जाएं। तो भी आंख नहीं देख पाएगी। उसका एक क्षेत्र है। जहां आंख। देखती है। और उस क्षेत्र के उस पार या इस पार आँख एक प्रकार से अंधी हो जाती है। और इंसान तो इतने निकट है कि आँख के पास ही नहीं है। आँख के पीछे हैं। बस यही अर्चन है। ऐसे समझें। की दर्पण के सामने खड़े हो तो एक खास दूरी से दर्पण पर प्रतिबिंब। ठीक-ठाक बनेगा। अगर बहुत दूर चले जाएं तो दर्पण पर प्रतिबिंब नहीं बनेगा बहुत पास आ जाए। दर्पण को आप अपने आपसे ही लगा ले। तो भी प्रतिबिंब दिखाई नहीं पड़ेगा। लेकिन यहां मामला ऐसा है। की पीछे खड़े हैं। दर्पण पर प्रतिबिंब बनने का कोई उपाय ही नहीं है।
आंख आगे हैं आप पीछे हैं। आँखे देखती है उसको।जो आँख के आगे है। आँख उसको कैसे देखें? जो आपके पीछे है। कान सुनते हैं उनको जो कान के बाहर है।उसको कैसे सुने जो कान के भीतर है? आँख बाहर खुलती है। कान भी बाहर खुलती है। मैं आपको छू सकता हूं। अपने को कैसे छूउ और अगर अपने शरीर को छू भी लेता हूं। तो वह इस लिए कि शरीर भी मैं नहीं हूं। वह भी पराया है। इसलिए छू लेता हूं। लेकिन जो मैं हूं। जो छू रहा है । उसे कैसे छूउ हूं? उसे किससे छूउ। इसीलिए हाथ सब छू लेता है। और खुद को नहीं छु पाते हैं आँख सब देख लेती है। और खुद को ही नहीं देख पाती है। अपने लिए हम बिल्कुल अंधे हैं। हमारी कोई इंद्रियां काम की नहीं है। जिन जिन इंद्रियों से हम परिचित हैं।
वे कोई भी काम की नहीं है। अगर कोई और इंद्रियां का उद्घाटन ना हो। जो भीतर देखती हो हो। अगर कोई और आँख ना खुल जाए जो भीतर देखती हो। जो पीछे देखती हो। जो उल्टा देखती हो। कोई कान न खुल जाए।जिस पर भीतर की ध्वनि तरंगे भी प्रभाव डालती हो। तब तक हम स्वयं को देख जान और सुन नहीं पाएंगे। तब तक हमें स्वयं को छूने का कोई उपाय नहीं है। जो निकट है वह चूक जाता है।अनजान रह जाता है जो निकट से भी निकट। वह असंभव है। इसलिए। मछली।सागर को नहीं जान पाती है। दूसरी बात सागर में ही पैदा होती है। सागर में ही जीती है। सागर ही उसका भोजन। सागर ही उसका पेय है सागर ही उसका प्राण । सागर है सब कुछ। फिर सागर में ही मरती। और लीन हो जाती है। जानने के लिए मौका नहीं मिलता। क्योंकि दूरी नहीं मिलती? फ़ासला नहीं मिलता। मछली को सागर का पता चलता है। तब। अगर कोई उठाकर उसे सागर के किनारे फेंक दें। तभी। यह बड़ी उल्टी बात हुई। सागर का पता तब चलता है जब सागर दूर हो जाए। तो मछली तड़पती है रेत पर। धूप में। तब उसे सागर का पता चलता है। क्योंकि इतने दूरी तो चाहिए पता चलने के लिए पैदा होने के बाद भी। पहले जो मौजूद था। और मरने के बाद भी जो मौजूद रहेगा। और जिस में ही पैदा हुए हैं। और जिसमें ही लीन हो गए। उसका पता कैसे चलेगा? पता चलने के लिए थोड़ी दूरी। थोड़ा बिछूड़न। थोड़ा बियोग होना चाहिए। इसलिए मछली को सागर का पता नहीं चलता है। किनारे पर कोई फेंक दे तो पता चलता है। आदमी की और भी मुसीबत है। क्योंकि परमात्मा सागर ही सागर है? उसका कोई किनारा नहीं। जिस पर उसको फेंका जा सके। यहां तड़पने लगे मछली की तरह। ऐसा कोई किनारा होता। तो बड़ी आसानी हो जाती। ऐसा कोई किनारा नहीं है परमात्मा सागर है सागर है। इसलिए तो जो परमात्मा में किनारा खोजते है। वे उसे कभी नहीं खोज पाते है । जो परमात्मा की मझधार में डूबने को राजी है। उसको ही किनारा मिलता है। किनारा है ही नहीं।इसलिए खोजने का कोई उपाय नहीं है और । किनारा हो भी कैसे सब चीजों का किनारा हो सकता है। लेकिन जो समस्त है। उसका किनारा नहीं हो सकता।जो परमात्मा के मझधार में डूब गया उसको किनारा मिल गया )
