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सपा गठबंधन भी महंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दों के साथ ही पिछड़ेपन से जूझ रहे क्षेत्र में कोई भारी उद्योग न लगाने पर डॉ. पाण्डेय को घेरते हुए भाजपा की हैट्रिक पर ब्रेक लगाने की कोशिश में है। अबकी बसपा बेअसर है। चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों में सभी दलों के बड़े नेता यहां सियासी हवा का रुख अपनी ओर मोड़ने को ताबड़तोड़ जनसभाएं करने में जुटे हैं। पेश से चंदौली लोकसभा क्षेत्र से राज्य करन भास्कर की ग्राउंड रिपोर्ट

सपा गठबंधन भी महंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दों के साथ ही पिछड़ेपन से जूझ रहे क्षेत्र में कोई भारी उद्योग न लगाने पर डॉ. पाण्डेय को घेरते हुए भाजपा की हैट्रिक पर ब्रेक लगाने की कोशिश में है। अबकी बसपा बेअसर है। चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों में सभी दलों के बड़े नेता यहां सियासी हवा का रुख अपनी ओर मोड़ने को ताबड़तोड़ जनसभाएं करने में जुटे हैं। पेश से चंदौली लोकसभा क्षेत्र से राज्य करन भास्कर की ग्राउंड रिपोर्ट:-

चंदौली लोकसभा सीट की पांच विधानसभाओं में मुगलसराय, सकलडीहा, सैयदराजा के साथ ही वाराणसी जिले की शिवपुर और सुरक्षित सीट अजगरा है। वर्तमान में चार विधानसभा सीटों पर भाजपा और सकलडीहा पर सपा का कब्जा है। इस बार सपा-कांग्रेस साथ है तो बसपा अकेले। भाजपा ने जहां फिर डॉ. महेन्द्र पाण्डेय पर दांव लगाया है वहीं सपा ने अबकी पूर्व मंत्री वीरेंद्र सिंह को मैदान में उतारा है। बसपा से सत्येन्द्र कुमार मौर्य मैदान में हैं।

 

गौर करने की बात यह है कि अपना दल(एस) के साथ ही सुभासपा, निषाद पार्टी के भी एनडीए में शामिल होने और जनवादी पार्टी के संजय चौहान का समर्थन मिलने से इस बार जहां भाजपा जातीय समीकरण साधने में कामयाब दिख रही है वहीं, मोदी-योगी सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर कराए गए विकास कार्यों का प्रभाव खासतौर से शिवपुर व अजगरा सीट पर है। पूर्वांचल में वाराणसी से बिहार सीमा तक लगने वाली चंदौली लोकसभा सीट का ज्यादातर हिस्सा ग्रामीण है। ‘धान का कटोरा’ कहे जाने वाले चंदौली क्षेत्र को 27 वर्ष पहले मायावती ने वाराणसी से अलग कर जिला बनाया था। तकरीबन 18,36,000 मतदाताओं वाला चंदौली आज भी पिछड़ेपन से उबरा नहीं है। यहां के ज्यादातर निवासी खेती पर निर्भर है लेकिन सिंचाई के पर्याप्त साधन नहीं है।बुनियादी सुविधाओं का हाल भी बदतर है इसलिए क्षेत्रवासियों की नाराजगी जनप्रतिनिधियों के प्रति देखने को मिलती है। हालांकि, सिंचाई के साधन से लेकर पिछड़ेपन को दूर करने को चुनाव में विकास के मुद्दे पर जातीय समीकरण कहीं ज्यादा हावी है। तकरीबन 25 फीसद वंचित समाज के साथ ही क्षेत्र में पिछड़े वर्ग से यादव, राजभर, निषाद-बिंद, पटेल-कुर्मी, मौर्य-कुशवाहा बिरादरी का दबदबा है। ब्राह्मण और क्षत्रियों के भी ठीक-ठाक वोट हैं। मुस्लिम आबादी 10 प्रतिशत से भी कम है।

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